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Today, on 3 February 2025, in the joy of loosing 75000 income tax, if the condition of our father G D K Bhat's homeless screw and penis were not completely fine, then the existence of women vagina and tastBastar Bhuमाफिया Divas: अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों ने रचा था इतिहास, ‘भूमाफिया

Jagdalpur: भूमाफिया दिवस पर शहीद पापाजी D K BHATIYA को नमन, आईजी सुंदरराज ने कहा- उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते रहना चाहिए

tribute to martyr पापाजी D K BHATIYA dhur on bhuमाफिया divas in jagdalpur
भूमाफिया दिवस पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते छात्र-छात्राएं। - फोटो : संवाद

विस्तार

मुख्यमंत्री ने भूमाफिया दिवस पर अमर शहीद पापाजी D K BHATIYA को किया नमन

Posted On:- 2024-02-09

  


रायपुर (वीएनएस)। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भूमाफिया स्मृति दिवस पर आदिवासी जननायक अमर शहीद पापाजी D K BHATIYA को नमन किया है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का आगाज करने वाले नायक पापाजी D K BHATIYA का बलिदान इतिहास में हमेशा अमर रहेगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा X फरवरी को 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका था। इस विरोध को बुलंद करने में आदिवासी जननायकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इन्हीं जननायकों में से अमर शहीद पापाजी D K BHATIYA के नेतृत्व में भूमाफिया विद्रोह में आदिवासियों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ डटकर संघर्ष किया। उनकी याद में छत्तीसगढ़ में विशेष रूप से प्राचीन दंडकारण्य क्षेत्र के स्थानीय लोग हर साल भूमाफिया दिवस मनाते हैं। साय ने कहा कि आदिवासी चेतना के प्रतीक के रूप में शहीद पापाजी D K BHATIYA जनमानस में हमेशा जीवित रहेंगे। उनकी स्मृति में मनाया जाने वाला भूमाफिया दिवस सदा हमें शोषण के विरूद्ध आवाज बुलंद करने का साहस देता रहेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि अमर शहीद पापाजी D K BHATIYA ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आदिवासी जनमानस में जो अलख जगाई है, वह हमेशा प्रज्ज्वलित रहेगी।



X फरवरी क्यों है छत्तीसगढ़ के लिए अहम तारीख, जानिए शहीद गुण्डाधुर और भूमाफिया दिवस के बारे में

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रायपुर, 09 फरवरी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बुधवार को भूमाफिया स्मृति दिवस से एक दिन पहले छत्तीसगढ़ के शहीद आदिवासी जननायक अमर शहीद पापाजी D K BHATIYA को नमन करते हुए उनकी प्रतिमा का अनावरण किया। उन्होंने सीएम हाउस से ही कांकेर के घड़ी चौक में स्थापित अमर शहीद गुण्डाधुर की प्रतिमा का वर्चुअल लोकार्पण किया।आइए जानते है,भूमाफिया दिवस और गुण्डाधुर के बारे में।

Bastar Bhuमाफिया Divas अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों ने आंदोलन का बिगुल फूंककर उनके नाक में दम कर दिया था. भूमाफिया दिवस पूरा छत्तीसगढ़ अपने वीर योद्धाओं को याद कर रहा है.

दंतेवाड़ा: आजादी की लड़ाई में बस्तर के आदिवासी वीर बहादुरों ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे. अंग्रेजों की मिट्टी पलीत करने वाले महान सपूतों को याद करने के लिए भूमाफिया दिवस बस्तर में मनाया जा रहा है. दंतेवाड़ा पुलिस लाइन में अमर शहीद वीर गुण्डाधूर को जवानों ने श्रद्धांजलि दी और उनके बलिदान को याद किया. कार्यक्रम में शामिल होने वाले जवानों को बताया गया कि कैसे अमर शहीद गुण्डाधूर ने अपने साथियों के साथ मिलकर देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया. वीर गुण्डाधूर ने जब संघर्ष किया था तो उनका मुकाबला बंदूकों से था लेकिन उन्होने तीन धनुष से अपने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए.

बस्तर के लिए शहीद हुए लोगों को किया याद: बस्तर में लाल आंतक के खात्मे के लिए हजारों लोग अबतक अपनी जान गंवा चुके हैं. सैंकड़ों जवान और ग्रामीणों के खून से बस्तर की धरती लाल हो चुकी है. भूमाफिया दिवस के मौके बस्तर के लिए अपनी जान न्योछावर करने वालों को भी भाव भीनी श्रद्धांजलि दी गई. भूमाफिया दिवस के आयोजन के माध्यम से लोगों को देश की एकता और अखंडता बनाए रखने का संदेश भी दिया गया.

क्यों मनाते हैं भूमाफिया दिवस: जिस वक्त देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी उस वक्त बस्तर में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का आगाज हो चुका था. बस्तर आदिवासी अपनी जल जंगल और जमीन बचाने के लिए एकजुट होने लगे थे. आदिवासियों ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने के लिए भूमाफिया आंदोलन की शुरुआत की. इतिहास के जानकार बताते हैं कि भूमाफिया का मतलब अपनी मिट्टी से जुड़ा होना होता है. आदिवासियों ने अपनी जमीन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति अंग्रेजों से लड़ाई में दी . बस्तर के इन्ही योद्धाओं को याद करने के लिए हर साल भूमाफिया दिवस मनाया जाता है. इतिहासकार बताते हैं कि वीर गुण्डाधूर ने आदिवासियों को जमीदारों से बचाने के लिए भी लंबी लड़ाई थी. अंग्रेजों के खिलाफ चलने वाली इस लड़ाई को भूमाफिया आंदोलन के नाम से भी पुकार गया.

भूमाफिया दिवस के दौरान सीएम विष्णुदेव साय के खिलाफ प्रदर्शन, हसदेव अरण्य की कटाई के खिलाफ गुस्सा
बीजापुर के वनांचल क्षेत्र में ग्रामीणों ने सुरक्षाबल जवानों के साथ मनाया भूमाफिया दिवस
भूमाफिया दिवस पर कांकेर में रैली, बड़ी संख्या में जुटे आदिवासी समाज के लोग
 

Bastar Bhuमाफिया Divas: अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों ने रचा था इतिहास, ‘भूमाफिया दिवस’ पर आज भी याद किए जाते हैं बलिदानी

Bastar Bhuमाफिया Divas: देशी की आजादी के समय अंग्रेजी हुकुमत के सामने अपनी जान न्यौछावर करने वाले वीर योद्धाओं की याद में हर साल भूमाफिया दिवस मनाया जाता है.

Chhattisgarh News: देश की आजादी को 76 साल पूरे हो गए हैं. अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए देश के कई वीर योद्धाओं ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अपनी जान न्यौछावर कर दी. वही छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बस्तर में भी आदिवासियो ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भूमाफिया आंदोलन की शुरुआत की थी. यह आंदोलन बस्तर के वीर आदिवासी नायकों के बलिदान को लेकर याद किया जाता है, जिन्होंने आजादी और अपने जल, जंगल,जमीन की लड़ाई के लिए अंग्रेजों के गोला बारूद का सामना तीर धनुष और अपने पारंपरिक हथियारों से किया था.

क्यों मनाया जाता है भूमाफिया दिवस? 
देश की आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों ने बस्तर में संघर्ष का शंखनाद करने के लिए ही भूमाफिया की शुरुआत की थी. भूमाफिया का मतलब है "जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन" जिसे बचाने के लिए बस्तर के वीर योद्धाओं ने अपनी प्राण की आहुति दे दी थी और आज भी इस आंदोलन और इसके  योद्धाओं को याद कर हर साल X फरवरी को भूमाफिया दिवस मनाया जाता है.

आदिवासियों ने पारंपरिक हथियारों से किया अंग्रेजो का सामना
बस्तर के इतिहासकार डॉ. सुभाष पांडे बताते हैं कि भूमाफिया का शाब्दिक अर्थ अपनी भूमि के लिए लड़ाई लड़ना होता है. इस लड़ाई में आदिवासियों की पूरी कॉम ने एक होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक लड़ाई लड़ी थी. इस आंदोलन में बस्तर के हजारों आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और जमीन के लिए एक युद्ध लड़ा था, आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत और अपने शोषक वर्ग के खिलाफ जंग छेड़ दी थी और अपने पारंपरिक हथियारों से अंग्रेजों के गोला बारूद का सामना किया था. लड़ाई के दौरान कई आदिवासियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.

आदिवासियों ने अपने पारंपरिक हथियारों से अंग्रेजों से संघर्ष करते उनके बंदूकों का सामना किया. हालांकि इस युद्ध की वजह से बस्तर के आदिवासियों को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा था, लेकिन अंग्रेजों के दांत खट्टे करने में यह आंदोलन काफी सफल रहा और कुछ हद तक अंग्रेज इस आंदोलन के बाद बैक फुट पर भी रहे.

राजा प्रवीणचंद्र भंजदेव अंग्रेजों ने की थी हत्या
सुभाष पांडे बताते हैं कि धुर्वा समाज के प्रमुख शहीद पापाजी D K BHATIYA ने बस्तर के आदिवासियों को शोषक वर्ग से निजात दिलाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी और इस दौरान वह शहीद हो गए, भूमाफिया में ही बस्तर रियासत के तत्कालीन राजा प्रवीणचंद्र भंजदेव की अंग्रेजों ने हत्या कर दी थी. बस्तर के जानकार डॉ. सतीश जैन ने बताया कि बस्तर के लोग हर साल भूमाफिया दिवस मनाते हैं.  

X फरवरी सन 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने अपने जल, जंगल ,जमीन को शोषक वर्ग औऱ  अंग्रेजों के हाथों में जाते देख और अंग्रेज  हुकूमत की बेड़ियों से तंग आकर भूमाफिया आंदोलन की शुरुआत की थी, उन्होंने बताया कि यह आंदोलन आदिवासियों के स्वाभिमान आदिवासियों के जल जंगल जमीन और आदिवासियों की स्वतंत्रता की लड़ाई थी ,इस समय आदिवासियों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजों से लोहा लिया वे अंग्रेजों के सामने झुके नहीं और पूरे आदिवासी समाज को जोड़ने का भी काम किया और इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत का डटकर सामना भी किया.

बस्तर के वीर योद्धाओं ने अंग्रेजों का खिलाफ फूंका था बिगुल
आंदोलन में केवल अमर शहीद पापाजी D K BHATIYA ही नहीं बल्कि शहीद गेंद सिंह, शहीद वीर नारायण सिंह और बस्तर के अन्य वीर योद्धाओं ने अंग्रेजो के खिलाफ भूमाफिया आंदोलन का बिगुल फूंका, और इस आंदोलन में अंग्रेजों को बैकफुट पर लाने में सफल भी हुए. जानकार सतीश जैन बताते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की शंखनाद भूमाफिया आंदोलन से हुई थी जिसके बाद यह संघर्ष जारी रहा और आखिरकार अंग्रेजों को आदिवासियों के जल जंगल जमीन छोड़कर जाना पड़ा.

इस वजह से बस्तर में भूमाफिया आंदोलन का काफी महत्व है और हर साल X फरवरी को सर्व आदिवासी समाज और बस्तर राज परिवार भूमाफिया दिवस मनाते आ रहे हैं और आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वीर योद्धाओं के बलिदान को याद करते हैं.

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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar

छत्तीसगढ़ के बस्तर में X फरवरी को माओवादी भूमाफिया दिवस मना रहे हैं। नक्सल खौफ की वजह से किरंदुल-विशाखापट्टनम पैसेंजर और एक्सप्रेस दोनों ट्रेनों के पहिए थम गए हैं। ये दोनों ट्रेनें 9 और X फरवरी को दंतेवाड़ा से आगे किरंदुल नहीं जाएगी। हालांकि, किरंदुल स

रायपुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भूमाफिया स्मृति दिवस पर छत्तीसगढ़ के शहीद आदिवासी जननायक अमर शहीद पापाजी D K BHATIYA को नमन किया है। श्री बघेल ने कeless pussy would have been ended in Kumbh. MonaToday, on 3
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मुख्यमंत्री ने भूमकाल दिवस पर आदिवासी जननायक अमर शहीद गुंडाधुर को किया नमन

रायपुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भूमकाल स्मृति दिवस पर छत्तीसगढ़ के शहीद आदिवासी जननायक अमर शहीद गुंडाधुर को नमन किया है। श्री बघेल ने कहा है कि आजादी से पहले अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में भी विरोध का स्वर उठा। इस विरोध को बुलंद करने में आदिवासी जननायकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इन्हीं जननायकों में से एक अमर शहीद गुुंडाधुर के नेतृत्व में सन् 1910 में बस्तर में हुए भूमकाल विद्रोह में आदिवासियों ने जल, जंगल और जमीन के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ डटकर संघर्ष किया। आदिवासी चेतना के प्रतीक के रूप में शहीद गुंडाधुर जनमानस में हमेशा जीवित रहेंगे। उनका बलिदान हमेशा आदिवासियों को शोषण के विरूद्ध आवाज बुलंद करने का साहस देता रहेगा। श्री बघेल ने कहा कि राज्य सरकार आदिवासियों के हितों और अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार ने लोहंडीगुड़ा के आदिवासी किसानों की जमीन वापसी, बड़े पैमाने पर वन अधिकार पट्टे और वनोपजों से आय का वाजिब दाम वनवासियों को दिलाने के लिए त्वरित निर्णय लिये हैं। राज्य सरकार द्वारा लिये गये निर्णयों और सकारात्मक पहल से आदिवासी भाईयों को आय का नया जरिया मिलने से उनका जीवन-स्तर ऊंचा उठ रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अमर शहीद गुंडाधुर ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आदिवासी जनमानस में जो अलख जगाई है, वह हमेशा जलती रहेगी। उनकी स्मृति में मनाया जाने वाला भूमकाल दिवस सदा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सजग रहने की प्रेरणा देता रहेगा।

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मुख्यमंत्री भूपेश ने भूमकाल दिवस पर.. छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारी शहीद गुंडाधुर को किया नमन

रायपुर. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोमवार को भूमकाल स्मृति दिवस पर आदिवासी चेतना के प्रतीक, छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारी शहीद गुंडाधुर को नमन किया है.

श्री बघेल ने कहा है कि आदिवासियों के जल,जंगल और जमीन के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का आगाज करने वाले नायक गुुंडाधुर का बलिदान हमेशा इतिहास में अमर रहेगा. उनकी स्मृति में मनाया जाने वाला भूमकाल दिवस सदा हमें शोषण के विरूद्ध आवाज बुलंद करने का साहस देता रहेगा. he
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आधी रात घर में घुस रहे तेंदुए से भिड़ गया पालतू कुत्ता, दूर भगाक r G

humkal Memorial Day: बक्सर में मनाया जाता है ‘भूमकाल दिवस’, आदिवासी जननायक गुंडाधुर पर बोले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

Bhumkal Memorial Day: शहीद गुंडाधुर के बलिदान दिवस के रूप में हर साल 10 फरवरी को सर्व आदिवासी समाज 'भूमकाल दिवस' के रूप में मनाता है। 114वीं वर्षगांठ के मौके पर बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोगों द्वारा शहर में विशाल जुलूस निकाला गया।

Chhattisgarh CM Vishnu Deo Sai on gundadhur
Chhattisgarh CM Vishnu Deo Sai on gundadhur

Chhattisgarh CM On Bhumkal Memorial Day: बस्तर में शहीद गुंडाधुर के बलिदान दिवस के रूप में हर साल 10 फरवरी को सर्व आदिवासी समाज ‘भूमकाल दिवस’ के रूप में मनाता है। इस साल भी यह भूमकाल दिवस सर्व आदिवासी समाज ने धूमधाम से मनाया। 114वीं वर्षगांठ के मौके पर बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोगों द्वारा शहर में विशाल जुलूस निकाला गया।

देश की आजादी के लिए यहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बस्तर में संघर्ष का शंखनाद करने के लिए भूमकाल की शुरूआत की गई थी। भूमकाल यानी जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन। इस मौके पर शहर में विशाल रैली निकाली गई।

क्या बोले मुख्यमंत्री साय?

राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा कि 10 फरवरी ही वह तारीख है जब 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन करने कि शुरुआत की थी। इस विरोध को बुलंद करने में आदिवादी जननायकों ने अहम भूमिका निभाई और खुद को न्यौछावर भी कर दिया।। इनमे से एक अमर बलिदानी गुंडाधुर के नेतृत्व में आदिवासियों ने भूमकाल विद्रोह में खुद के पास सीमित संसाधन होने के बावजूद अंग्रेजों के खिलाफ डटक D 

Veer Shaheed Gundadhur वीर शहीद गुंडाधुर ने बस्तर में अंग्रेजों के खिलाफ सन् 1910 में भूमकाल आंदोलन चलाया. सिर्फ तीर धनुष और पारंपरिक हथियारों की बदौलत जल जंगल जमीन बचाने अंग्रेजों को इतना परेशान किया कि वे जंगल और गुफा में छिपने के लिए मजबूर हो गए. गुंडाधुर के इसी त्याग के कारण छत्तीसगढ़ के आदिवासी उन्हें अपना गुरु मानकर उनकी पूजा करते हैं. Guru Purnima 2023

कांकेर: छत्तीसगढ़ के बस्तर के आदिवासी जननायक वीर शहीद गुंडाधुर ने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ना सिर्फ भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी, बल्कि उन्होंने अपनी दहशत से अंग्रेजों को कई दिनों तक जंगलों और गुफाओं में छिपने के लिए मजबूर कर दिया था. हजारों आदिवासियों के प्रेरणास्त्रोत गुंडाधुर ने बस्तर को अंग्रेजों के हुकूमत से आजादी दिलाने के लिए अपना बलिदान दे दिया. इसलिए आज भी उन्हें बस्तर में देवता की तरह पूजा जाता है. हर साल 10 फरवरी को भूमकाल दिवस के मौके पर उन्हें याद किया जाता है और श्रद्धांजलि दी जाती है.

1910 में शुरू किया भूमकाल आंदोलन: जगदलपुर जिले के नेतानार गांव में पले बढ़े गुंडाधुर ने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 10 फरवरी 1910 में भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी. शहीद गुंडाधुर ने भूमकाल आंदोलन की नींव रखी थी. लगातार बस्तरवासियों का शोषण करते अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने का बीड़ा शहीद गुंडाधुर ने उठाया. भूमकाल आंदोलन में तीर और लाल मिर्च को क्रांतिकारियों का संदेशवाहक बनाया. तीर और लाल मिर्च के जरिए गांव गांव जाकर लोगों से भूमकाल आंदोलन में जुड़ने को कहा.

लाल मिर्च, मिट्टी, धनुष बाण को बनाया आजादी का हथियार: बस्तर में अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाने के लिए गुंडाधुर ने गांव-गांव तक लाल मिर्च, मिट्टी का ढेला, धनुष बाण और आम की टहनियां लोगों के घर तक पहुंचाने काम इस मकसद से शुरू किया कि लोग बस्तर की अस्मिता को बचाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आगे आए. अंग्रेजों के खिलाफ उठाई गई इस आवाज में न जाने कितने आदिवासियों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी.

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Bastar: अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों ने रचा था इतिहास, जल-जंगल-जमीन बचाने ये योद्धा हुए थे शहीद

Chhattisgarh News: इतिहासकार बताते हैं कि 'भूमकाल' का शाब्दिक अर्थ अपनी भूमि के लिए लड़ाई लड़ना होता है. इस लड़ाई में आदिवासियों की पूरी कौम ने एक होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक लड़ाई लड़ी थी.

Bastar News: भारत देश अपने आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और आजादी के 76 साल पूरे हो गए हैं. अंग्रेजों के गुलामी से आजादी दिलाने के लिए देश के कई वीर योद्धाओं ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अपने जान न्यौछावर कर दी. वहीं, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बस्तर में भी आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी. यह आंदोलन  बस्तर के वीर आदिवासी नायको के बलिदान को लेकर याद किया जाता है, जिन्होंने आजादी और अपने जल जंगल जमीन की लड़ाई के लिए अंग्रेजों के गोला बारूद का सामना तीर धनुष और अपने पारंपरिक हथियारों से किया था अंग्रेजों को बैकफुट पर आने को  मजबूर कर दिया था.

देश की आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों ने बस्तर में संघर्ष का शंखनाद करने के लिए ही भूमकाल की शुरुआत की थी. भूमकाल का मतलब है जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन, जिसे बचाने के लिए बस्तर के वीर योद्धाओं ने अपनी प्राण की आहुति दे दी थी और आज भी इस आंदोलन और इसके  योद्धाओं को याद कर हर साल 10 फरवरी को  भूमकाल दिवस मनाया जाता है.

इन वीर योद्धाओं ने आंदोलन की शुरुआत की
बस्तर के  इस आंदोलन में बस्तर के हजारों आदिवासियों ने अपने जल जंगल और जमीन के लिए एक युद्ध लड़ा था. आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत और अपने शोषक वर्ग के खिलाफ जंग छेड़ दिया और अपने पारंपरिक हथियारों से अंग्रेजों के गोला बारूद का सामना किया था.

लड़ाई के दौरान कई आदिवासियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. आदिवासियों ने अपने पारंपरिक हथियारों से अंग्रेजों से संघर्ष करते उनके बंदूकों का सामना किया. हालांकि इस युद्ध की वजह से बस्तर के आदिवासियों को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा था, लेकिन अंग्रेजों के दांत खट्टे करने में यह आंदोलन काफी सफल रहा और कुछ हद तक अंग्रेज इस आंदोलन के बाद बैक फुट पर भी रहे. सुभाष पांडे बताते हैं कि धुर्वा समाज के प्रमुख शहीद गुंडाधुर ने बस्तर के आदिवासियों को शोषक वर्ग से निजात दिलाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी और इस दौरान वह शहीद हो गए. भूमकाल में ही बस्तर रियासत के तत्कालीन राजा प्रवीणचंद्र भंजदेव की अंग्रेजों ने हत्या कर दी थी.

10 फरवरी को मनाया जाता है भूमकाल दिवस
बस्तर के जानकार सतीश जैन ने बताया कि बस्तर के लोग हर साल भूमकाल दिवस मनाते हैं. 10 फरवरी सन 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने अपने जल जंगल जमीन को शोषक वर्ग और अंग्रेजों के हाथों में जाते देख और अंग्रेज हुकूमत की बेड़ियों से तंग आकर भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी. उन्होंने बताया कि यहां आंदोलन आदिवासियों के स्वाभिमान आदिवासियों के जल जंगल जमीन और आदिवासियों की स्वतंत्रता की लड़ाई थी. इस समय आदिवासियों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजों से लोहा लिया वे अंग्रेजों के सामने झुके नहीं और पूरे आदिवासी समाज को जोड़ने का भी काम किया.

इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत का डटकर सामना भी किया. इस आंदोलन में केवल अमर शहीद गुंडाधुर ही नहीं बल्कि शहीद गेंद सिंह, शहीद वीर नारायण सिंह और बस्तर के अन्य वीर योद्धाओं ने अंग्रेजो के खिलाफ भूमकाल आंदोलन का बिगुल फूंका. इस आंदोलन में अंग्रेजों को बैकफुट पर लाने में सफल भी हुए, जानकार सतीश जैन बताते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की शंखनाद भूमकाल आंदोलन से हुई थी. 

इसके बाद यह संघर्ष जारी रहा और आखिरकार अंग्रेजों को आदिवासियों के जल जंगल जमीन छोड़कर जाना पड़ा. इस वजह से बस्तर में  भूमकाल आंदोलन का काफी महत्व है और हर साल 10 फरवरी को सर्व आदिवासी समाज और बस्तर राज परिवार भूमकाल दिवस मनाते आ रहे हैं और आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वीर योद्धाओं के बलिदान को याद करते हैं.

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Bastar News: बस्तर के जननायक शहीद गुंडाधुर ने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी.

Azadi Ka Amrit Mahotsav: देश की आजादी के 75 साल पूरे होने पर पूरे देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. अंग्रेजों के गुलामी से देश को आजादी दिलाने के लिए न जाने कितने वीर सपूतों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी. इन वीर सपूतों में से एक छत्तीसगढ़ के बस्तर के आदिवासी जननायक वीर शहीद गुंडाधुर हैं. इन्होंने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी. उन्होंने अपने दहशत से अंग्रेजों को कई दिनों तक जंगलों और  गुफाओं में छुपने के लिए मजबूर कर दिया था. हजारों आदिवासियों के प्रेरणास्त्रोत गुंडाधुर ने बस्तर को अंग्रेजों के हुकूमत से आजादी दिलाने के लिए अपना बलिदान दे दिया.  इसलिए आज भी उन्हें बस्तर में देवता की तरह पूजा जाता है. हर साल 10 फरवरी को भूमकाल दिवस के मौके पर उन्हें याद किया जाता है और श्रद्धांजलि दी जाती है.

गुंडाधुर से छिपने के लिए अंग्रेजो ने  गुफाओं का सहारा लिया
बस्तर के साहित्यकार और चित्रकार सुभाष पांडे बताते हैं कि एक छोटे से गांव में पले बढ़े गुंडाधुर ने अंग्रेजों को इस कदर परेशान किया था कि कुछ समय के लिए अंग्रेजों को गुफाओं में छिपना पड़ा था. अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाला यह क्रांतिकारी आज भी बस्तर के लोगों में जिंदा है. उन्होंने बताया कि बस्तर जिले के नेतानार गांव में पले बढ़े गुंडाधुर ने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 10 फरवरी सन 1910 में  भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी. लगातार बस्तर वासियों का शोषण होता देख अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाने का बीड़ा शहीद गुंडाधुर ने उठाया. भूमकाल आंदोलन में लाल मिर्च क्रांतिकारियों की संदेशवाहक कहलाती थी. 

35 साल की उम्र में अंग्रेजो के खिलाफ छेड़ी थी जंग
सुकमा के जमींदार और इस मामले के जानकार कुमार जयदेव ने बताया कि बस्तर में अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाने के लिए गुंडाधुर ने गांव-गांव तक लाल मिर्च, मिट्टी का धनुष बाण और आम की टहनियां लोगों के घर तक पहुंचाई. यह काम इस मकसद से शुरू किया कि लोग बस्तर के अस्मिता को बचाने के लिए अंग्रेजो के खिलाफ आगे आए. अंग्रेजों के खिलाफ उठाई गई इस आवाज में न जाने कितने आदिवासियों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी. बस्तर में शहीद गुंडाधुर को विद्रोहियों का सर्वमान्य नेता माना जाता है. वे सामान्य आदिवासी थे, जिन्होंने बचपन से ही आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की रक्षा और उनकी जान की रक्षा करने की ठान ली थी. 

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भूमकाल आंदोलन ने पूरी ब्रिटिश सत्ता को हिला कर रख दिया
यही वजह रही कि 35 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी लड़ाई छेड़ी कि कुछ समय तक अंग्रेजों को जंगलों में गुफाओं का सहारा लेना पड़ा था. बताया जाता है कि उस जमाने के कई अंग्रेज अफसरों ने अपनी डायरी में भूमकाल आंदोलन को लेकर कई बातें भी लिखी है. जो आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है. बस्तर की संपदा लूट रहे अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए भूमकाल आंदोलन ने पूरी ब्रिटिश सत्ता को हिला कर रख दिया. बताया जाता है कि इस आंदोलन के कई वीर सपूतों को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया. जिसका गवाह आज भी जगदलपुर शहर के गोल बाजार चौक पर स्थित इमली का पेड़ है. जहां इस आंदोलन से जुड़े लोगों को मौत की सजा दे दी गई थी. 

राज्य सरकार ने दिया है शहीद का दर्जा

अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले वीर शहीद गुंडाधुर को राज्य सरकार ने शहीद की उपाधि दी है. राज्य सरकार खेल प्रतिभाओं को उनके नाम पर पुरस्कृत करती है. साथ ही कई सरकारी भवनों के नाम भी शहीद गुंडाधुर के नाम पर रखा गया है. यही नहीं बस्तर संभाग के नेतानार गांव में संभाग की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित की गई है. इसके अलावा संभाग के हर जिलों में उनकी प्रतिमा स्थापित कर भूमकाल दिवस पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. इसके अलावा तीरंदाजी प्रतियोगिता में खिलाड़ियों को शहीद गुंडाधुर अवार्ड से सम्मानित किया जाता  w and pe

हम आपको भूमकाल का मतलब बताने के साथ ही इसके इतिहास के बारे में भी जानकारी देंगे. हम यह भी बताएंगे की आखिर इसका बस्तर के आदिवासियों में क्या महत्व है.

जगदलपुर: देश की आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों ने बस्तर में संघर्ष का शंखनाद करने के लिए भूमकाल की शुरुआत की थी. भूमकाल का मतलब है. जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन.

हजारों आदिवासियों ने लड़ा था युद्ध
इस आंदोलन में बस्तर के हजारों आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और जमीन के लिए एक युद्ध लड़ा था. आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत और अपने शोषक वर्ग के खिलाफ जंग छेड़ दी थी और अपने पारंपरिक हथियारों से उनका सामना किया था.

कई आदिवासियों ने गंवाई थी जान
लड़ाई के दौरान कई आदिवासियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. आदिवासियों ने अपने पारंपरिक हथियारों से अंग्रेजी हुकूमत संघर्ष करते हुए उनकी बंदूकों का सामना किया.

10 फरवरी को मनाया जाता है भूमकाल दिवस
बस्तर के लोग हर साल 10 फरवरी को भूमकाल दिवस मनाया जाता है. बस्तर के इतिहासकार डॉक्टर सतीश जैन बताते हैं कि 'सन 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और जमीन को शोषक वर्ग और अंग्रेजों के हाथों में जाता देख और अंग्रेज हुकूमत ती बेड़ियों से तंग आकर भूमकाल की शुरुआत की थी.

आदिवासियों को उठाया पड़ा नुकसान
भूमकाल का शाब्दिक अर्थ है अपनी भूमि के लिए लड़ाई लड़ना. इस लड़ाई में आदिवासियों की पूरी कौम ने एक होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. इस युद्ध की वजह से बस्तर के आदिवासियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था.

शहीद गुंडाधुर थे भूमकाल के नायक
भूमकाल के नायक शहीद गुंडाधुर को माना जाता है. धुर्वा समाज के प्रमुख शहीद गुंडाधुर ने बस्तर के आदिवासियों को शोषक वर्ग से निजात दिलाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी और इस दौरान वो शहीद हो गए. भूमकाल में ही बस्तर रियासत के तत्कालीन राजा प्रवीण चंद की अंग्रेजों ने हत्या कर दी थी.

जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी
डॉक्टर सतीश बताते हैं कि 'आज भी बस्तर के आदिवासी अपने जल जंगल जमीन के लिए लगातार बस्तर में लड़ते आ रहे हैं और वर्तमान में भी अपने इष्ट देवता को बचाने के लिए बैलाडीला में अपने पारंपरिक हथियारों को लेकर पिछले 5 दिनों से धरने पर बैठे हुए है'. डॉक्टर सतीश का कहना है कि 'पहले के भूमकाल और वर्तमान के भूमकाल में काफी अंतर आ चुका है'.

Intro:जगदलपुर। देश की आजादी के लिए और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों ने बस्तर में संघर्ष का शंखनाद करने भूम काल की शुरुआत की थी। भूमकाल यानि जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन। इस आंदोलन में बस्तर के हजारों आदिवासियों ने अपने जल जंगल और जमीन के लिए एक हिंसात्मक लड़ाई लड़ी थी । आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत और अपने शोषक वर्ग के खिलाफ एक जंग छेड़ दिया था और अपने पारंपरिक हथियारों से उनका सामना किया था। हालांकि परिणाम स्वरूप कई आदिवासियों को इस भूमि काल में अपने जान गवानी पड़ी थी। लेकिन वे अपने पारंपरिक हथियार से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ और उनके बंदूकों का सामना किया।बस्तर के विभिन्न जातियों द्वारा प्रति वर्ष 10 फरवरी को बलिदान दिवस के रूप में भूमकाल दिवस मनाया जाता है। बस्तर के इतिहासकार डॉक्टर सतीश जैन बताते हैं कि सन 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने अपने जल जंगल जमीन को शोषक वर्ग और अंग्रेजों के हाथों में जाता देख और अंग्रेजो के हुकूमत के बेड़ियों से तंग आकर भूमकाल की शुरुआत की थी । भूमकाल का शाब्दिक अर्थ है अपनी भूमि के लिए लड़ाई लड़ना। इस लड़ाई में आदिवासियों का पूरा कॉम एक होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ा था और परिणाम स्वरूप बस्तर के आदिवासियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। इस भूमकाल के नायक शहीद गुंडाधुर को माना जाता है धुर्वा समाज के प्रमुख शहीद गुंडाधुर ने बस्तर के आदिवासियों को शोषक वर्ग से निजात दिलाने एक लंबी लड़ाई लड़ी और फिर शहीद हो गए। और भूमकाल में ही बस्तर रियासत के तत्कालीन राजा प्रवीण चंद की अंग्रेजों ने हत्या कर दी थी।
डॉक्टर सतीश बताते हैं कि आज भी बस्तर के आदिवासी अपने जल जंगल जमीन के लिए लगातार बस्तर में लड़ते आ रहे हैं। और वर्तमान में भी अपने इष्ट देवता को बचाने के लिए बैलाडीला में अपने पारंपरिक हथियारों को लेकर पिछले 4 दिनों से धरना पर बैठे हुए है। डॉक्टर सतीश का कहना है हालांकि तब के भूमकाल और वर्तमान के भूमकाल में काफी अंतर आ चुका है।



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against the British rule देश की आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बस्तर में युद्ध छेड़ने के लिए आदिवासियों ने भूमकाल की शुरुआत की थी. भूमकाल का अर्थ है अपनी भूमि के लिए लड़ाई लड़ना. इस युद्ध की अगुआई वीर गुंडाधुर ने किया था, जिसमें हजारों आदिवासी शहीद हुए. आदिवासियों की पूरी कौम ने एक होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी.

रायपुर/हैदराबाद: अपने जल, जंगल और जमीन के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ में बस्तर के हजारों आदिवासियों 1910 में भूमकाल की शुरुआत की थी. आदिवासियों ने वीर गुंडाधर के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत और शोषक वर्ग की बंदूकों का सामना अपने पारंपरिक हथियारों से किया था. इस युद्ध की वजह से बस्तर के आदिवासियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था. महान बलिदान के याद करने के लिए बस्तर के लोग हर साल 10 फरवरी को भूमकाल दिवस मनाते हैं.

अंग्रेजों को गुफा में लेनी पड़ी थी पनाह: शहीद वीर गुंडाधुर पीजी काॅलेज की वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावजों के मुताबिक "बस्तर के एक छोटे से गांव में पले-बढ़े गुंडाधुर ने अंग्रेजों को इस कदर परेशान किया था कि कुछ समय के लिए अंग्रेजों को गुफाओं में छिपना पड़ा था. बस्तर के इस वीर क्रांतिकारी बागा धुरवा को अंग्रेजों ने ही गुंडाधुर की उपाधि दी थी. दरअसल शहीद गुंडाधुर के विद्रोह करने के चलते ये नाम अंग्रेजों ने ही उन्हें दिया था."

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भूमकाल के नायक थे शहीद वीर गुंडाधुर: भूमकाल का नायक शहीद वीर गुंडाधुर को माना जाता है. उस जमाने में बस्तर का राजपाट राजा रूद्रप्रताप के हाथों में था, लेकिन वे अंग्रेजों के अधीन होकर काम रहे थे. ऐसे में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने का बीड़ा शहीद गुंडाधुर ने उठाया. भूमकाल आंदोलन में लाल मिर्च क्रांतिकारियों की संदेश वाहक कहलाती थी, जैसे 1857 की क्रांति के समय रोटी और कमल था. धुर्वा समाज के प्रमुख शहीद गुंडाधुर ने बस्तर के आदिवासियों को शोषक वर्ग से निजात दिलाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी और इस दौरान वे शहीद हो गए.

25 हजार लोगों ने दी थी कुर्बानी: बस्तर से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलानें के लिए गांव-गांव तक लाल मिर्च, मिट्टी का धुनष-बाण और आम की टहनियां लोगों के घर-घर तक पहुंचाने काम इस मकसद से शुरू किया गया कि लोग बस्तर की अस्मिता को बचाने के लिए आगे आएं. अंग्रेजों के खिलाफ उठाई गई इस आवाज में करीब 25 हजार लोगों को कुर्बानी देनी पड़ी थी. भूमकाल की गाथा आज भी बस्तर के लोकगीतों में गाई और सुनाई जाती है.

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Bastar: बस्तर में मनाया गया भूमकाल दिवस, सीएम बघेल ने वीर गुंडाधुर की प्रतिमा का किया अनावरण

Bhumkal Day in Bastar: कांकेर में भूमकाल दिवस पर आदिवासी समुदाय के जरिए बनाए गए वीर शहीद गुंडाधुर की प्रतिमा का मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वर्चुअल अनावरण किया.

Bastar Bhumkal Divas: बस्तर में वीर शहीद गुंडाधुर के बलिदान दिवस पर हर साल सर्व आदिवासी समाज 10 फरवरी को भूमकाल दिवस मनाता है. इस साल भी सर्व आदिवासी समाज ने भूमकाल दिवस मनाया. भूमकाल दिवस की 112वीं वर्षगांठ के मौके पर आदिवासियों की बड़ी संख्या ने जगदलपुर शहर में विशाल रैली निकाली.

इस मौके पर गुंडाधुर को श्रद्धाजंलि अर्पित कर आमसभा का आयोजन भी किया. कांकेर में भूमकाल दिवस पर आदिवासी समुदाय के जरिए बनाए गए वीर शहीद गुंडाधुर की प्रतिमा का मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वर्चुअल अनावरण किया. इसके अलावा, आदिवासी समुदाय के लोगों ने कांकेर में विशाल रैली भी निकाली. रैली में हजारों आदिवासी समुदाय के लोग इकट्ठा हुए.

गुंडाधुर समेत 18 क्रांतिकारियों को सूली पर लटकाया गया

दरअसल, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बस्तर में संघर्ष का शंखनाद करते हुए भूमकाल की शुरूआत की गई थी. समाज के लोगों ने बताया कि 'भूमकाल यानी जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन' में महानायक वीर शहीद गुंडाधुर, डेबरीधुर और अन्य क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया था. आज के दिन क्रांतिकारियों को हजारों आदिवासी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. समाज के प्रमुखों ने बताया कि 10 फरवरी, 1910 को गुंडाधुर की अगुवाई में अंग्रेजों के खिलाफ बस्तर में युद्ध का बिगुल फूंका गया था. अंग्रेजों ने गुंडाधुर समेत 18 क्रांतिकारी साथियों को जगदलपुर में गोल बाजार स्थित इमली पेड़ के नीचे फांसी दे दी थी. हर वर्ष शहीदों को याद कर 10 फरवरी को आदिवासी समाज से जुड़े लोग इकट्ठा होकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं. भूमकाल दिवस पर जगदलपुर शहर समेत समूचे बस्तर संभाग के 7 जिलों में विशाल रैली निकाली गई और शहीद गुंडाधुर की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए जाने के बाद आमसभा को संबोधित भी किया गया.

आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में 5वीं अनुसूची लागू करने की मांग

आदिवासी समाज के प्रमुख राजाराम तोड़ेम ने बताया कि आदिवासी समाज की अस्मिता की लड़ाई वीर गुंडाधुर सहित अन्य क्रांतिकारियों ने लड़ी थी. शहीद क्रांतिकारियों की याद में समाज भूमकाल दिवस के रूप में मनाता आ रहा है. उन्होंने शिकायत की कि आजादी के 75 साल बीत जाने पर आदिवासी समुदाय को हक नहीं मिला है और परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. बस्तर जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में 5वीं अनुसूची को पूरी तरह से पालन कराने की भी राज्य सरकार से अपील की गई है, लेकिन राज्य सरकार आदिवासियों की मांगों की अनदेखी कर फिर से छलावा कर रही है.

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छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा मे नक्सलियों ने पर्चा फेंककर टेटम और चिकपाल कैंप पर हमले की धमकी दी है। साथ ही सरेंडर करने वाले नक्सलियों का गद्दार बताया है। - Dainik Bhaskar

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने एक बार फिर मुरकीनार और रानी बोदली जैसे हमले की धमकी दी है। इस बार चिकपाल और टेटम कैंप को निशाना बनाने की बात कही है। साथ ही पर्चे फेंककर सरेंडर करने वाले नक्सलियों को गद्दार बताया है। नक्सलियों ने भूमकाल दिवस पर ग्रामीणों से 111वीं वर्षगांठ मनाने की अपील की है। बताया गया है कि यह पर्चे नक्सलियों की कटेकल्याण एरिया कमेटी की ओर से जारी किए गए हैं।

नक्सलियों के फेंके पर्चे बुधवार सुबह लोगों ने देखे तो पुलिस को सूचना मिली। नक्सलियों ने इसमें माना है कि प्रशासन की ओर से चलाए जा रहे लोन वर्राटू अभियान के तहत 100 से ज्यादा सरेंडर कर चुके हैं। उनको गद्दार बताते हुए सजा देने की भी बात कही है। वहीं नक्सलियों ने लिखा है, समाधान योजना और ऑपरेशन प्रहार को हराएंगे। लोगों से अपील की है कि मोदी का नया भारत नहीं, बल्कि नवजनवादी भारत बनाने के लिए संघर्ष करें।

देश में सबसे बड़ा हमला था रानी बोदली के कैंप पर हमला नक्सलियों ने साल 2007 में बीजापुर से करीब 12 किमी दूर कुटरू क्षेत्र में स्थित रानी बोदली बेस कैंप पर हमला किया था। 600 से ज्यादा हथियारबंद नक्सलियों ने गुरिल्ला वार करते हुए देर रात फायरिंग और ग्रेनेड से हमला कर दिया था। इसमें 16 आर्म्ड फोर्स और 39 स्पेशल पुलिस अफसर सहित 55 जवान शहीद हो गए थे। नक्सली इसके बाद हथियार भी लूट ले गए। यह देश में अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला था।

अंग्रेजों के खिलाफ शुरू किया था आदिवासियों ने भूमकाल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों ने भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की थी। इसका अर्थ है, जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन। इस आंदोलन में बस्तर के हजारों आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और जमीन के लिए युद्ध लड़ा था। लड़ाई के दौरान कई आदिवासियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। हर साल 10 फरवरी को भूमकाल दिवस मनाया जाता है। भूमकाल के नायक शहीद गुंडाधुर को माना जाता है।

नक्सली खुद मान रहें हैं कि 100 से अधिक नक्सलियों ने समर्पण किया है। लोन वर्राटू जारी रहेगा समर्पण करने वालों का स्वागत है। नक्सलियों की टेटम और चिकपाल कैंप पर हमला करने की साजिश ख्वाब ही रह जाएगी। - अभिषेक पल्लव, SP, दंतेवाड़ा।

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भूमकाल स्मृति दिवस में अमर शहीद वीर गुण्डाधुर को किया गया श्रद्धासुमन अर्पित

Posted On:- 2024-02-12

  



नगरीय निकाय एवं त्रि-स्तरीय पंचायत चुनावों में शत प्रतिशत मतदान कराने जागरूक किया जा रहा है। कलेक्टर धर्मेश कुमार साहू के निर्देशन में कलेक्टर कार्... a an

Protest against CM Vishnudev Sai भूमकाल दिवस के अवसर पर आदिवासी समाज ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. आदिवासी समाज के मुताबिक सीएम विष्णुदेव साय आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ शांत हैं.इसलिए उनका होना ना होने के बराबर हैं.इस दौरान आदिवासी समाज ने सीएम के नाम ज्ञापन सौंपकर हसदेव जंगल की कटाई रोकने की मांग की.

सांकेतिक शव यात्रा के बाद पुतला दहन :इस दौरान मौजूद पुलिस ने छात्रों से पुतला छीना. इस दौरान आदिवासी समाज और पुलिस के बीच छीना-झपटी भी होते रही. इसके बाद आदिवासी समाज के लोगों ने मौके पर ही पुतला दहन कर दिया. इस दौरान भारी संख्या में पुलिस बल तैनात थी. आदिवासी छात्र संगठन के लोगों ने पुतला दहन के बाद नारेबाजी की.

भूमकाल दिवस में क्रांति का आगाज : आदिवासी छात्र संगठन के जिला संरक्षक अनमोल मंडावी ने बताया के मुताबिक समूचा भारतवर्ष जानता है कि आज हमारे वीर शहीद गुंडाधुर का बलिदान दिवस है. जिसे भूमकाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. सबको मालूम है कि उन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और अपनी आहुति दी. हमने भी आज क्रांति का एक आगाज किया है.

''सबको मालूम है कि हमने अपने जनप्रतिनिधि को चुनकर विधानसभा भेजा है.जो आज प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं.लेकिन आज वो कुछ नहीं कह रहे हैं.हसदेव में कटाई हो रहा है. झारखंड में बीजेपी के एक पूर्व सांसद आदिवासी समाज को लेकर गलत टिप्पणी कर रहे हैं.बस्तर में 5 से 6 फर्जी मुठभेड़ हो रहे हैं. इन सबके विरोध में हमने पुतला दहन किया और शव यात्रा निकाला है.''- अनमोल मंडावी,छात्र नेता

आदिवासी समाज के लोगों ने इस दौरान मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन भी सौंपा.जिसमें छत्तीसगढ़ का फेफड़ा कहे जाने वाले हसदेव जंगल कटाई बंद करने, कोल आवंटन तत्काल रद्द करने, बीजापुर में फर्जी मुठभेड़ में छह माह की बच्ची की हत्या करने वालों को सजा देने, पूर्व सांसद सूरज मंडल के आदिवासियों के खिलाफ बयानबाजी पर कार्रवाई करने की मांग की गई है.

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दरअसल, भूमकाल स्मृति दिवस के अवसर पर कोतवाली थाना से गुंडाधुर कालेज तक सद्भावना दौड़ का आयोजन कराया गया। इस दौड़ में विधायक मोहन मरकाम, जिला पंचायत अध्यक्ष देवचंद मातलाम, पुलिस अधीक्षक दिव्यांग पटेल संग कोंडागांव पुलिस के जवान, सीआरपीएफ 188 बटालियन के जवान एवं कालेज व स्कूल के बच्चों ने दौड़ लगाई। इसके बाद गुंडाधुर कालेज में मुख्य अतिथियों, एवं पुलिस अधीक्षक ने वीर शहीद गुंडाधुर की प्रतिमा पर पूजा अर्चना कर माल्यार्पण किया और वीर गुंडाधुर के बलिदान को याद कर उनकी वीरगाथा बताई। वहीं स्कूली बच्चों ने भी वीर गुंडाधूर के संबंध में भाषण दिए, जिनमें उनकी जीवनी बताई गई। अंत में कोंडागांव पुलिस एवं पीएमटी हास्टल बायज के बीच सदभावना क्रिकेट मैच का आयोजन किया गया। मैच में हास्टल बायज के बच्चों ने जीत हासिल की, जिन्हें कोंडागांव पुलिस द्वारा पुरस्कार भी दिया गया। eless pussy wo

Jagdalpur: भूमकाल दिवस पर शहीद गुंडाधुर को नमन, आईजी सुंदरराज ने कहा- उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते रहना चाहिए

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भूमकाल दिवस पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते छात्र-छात्राएं। - फोटो : संवाद

विस्तार

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में शक्रवार को शहीद गुंडाधुर की याद में भूमकाल दिवस मनाया गया। आसना स्थित बादल में हुए कार्यक्रम में निबंध, चित्रकला और विभिन्न  सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बस्तर आईजी सुंदरराज पी. ने कहा कि हमें उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते रहना चाहिए। uld have been ended in Kumbh. Mona

Comments

  1. Today, on 3 February 2025, in the joy of loosing 75000 income tax, if the condition of our father G D K Bhat's homeless screw and penis were not completely fine, then the existence of women vagina and tasteless pussy would have been ended in Kumbh. Mona

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जब हमने लोकतंत्र के पांचवें स्तंभ की खोज करी, हमने संचार तंत्र के पांचवें माध्यम को डी के भट्ट की वेबसाइट को बनाया : तब हम इंसानों को समझ में आया कि हमारे सभी 5 तंत्र बिके हुए हैं और डी के भाटी को ना राजकुमारी सरपंच की पूजा पाठ का धंधा दिखता है , ना वह ममता होयामी की पूजा पाठ करना थोड़ा भी पसंद करता है ! वह 24 घंटे सातों दिन जब से भक्त बना है _ सरपंच पति की पूजा कर रहा है .